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Monday, November 17, 2008

धुंद मैं छिपा दिन्कर

कल तक सूरज प्राची मैं साफ़ दिखाई पड़ता था |
आज दिल्ली के जाडे मैं धुंद छा गयी ||
क्या कल तक दिख्ता रवि मेरा ब्रह्म था?
या बेमौसम पतझड़ मेरे जीवन मैं आगया?
इन प्रश्नों का उत्तर देसका तो जीवन के परीक्षा स्थल मैं दाखिला मिले
यही जीवन का अभी तक का अर्थ निकला |
और कितने परीक्षाएं हैं यह मालूम नहीं ना ही जाने की इच्छा होती है|
बस किसी तरह आज मन मैं खटकते प्रश्नों का उत्तर मिले येही है अभिलाषा बनी||